<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306</id><updated>2011-07-28T23:10:49.750-07:00</updated><category term='जीवन विद्या'/><category term='्चाहत'/><category term='भ्रम'/><category term='गाय'/><category term='भय'/><category term='शर्म'/><category term='ज्ञान'/><category term='प्रेम'/><category term='रुपया'/><title type='text'>sadhak ummed</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>23</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-8777184572333411210</id><published>2010-03-11T19:45:00.000-08:00</published><updated>2010-03-11T19:47:01.842-08:00</updated><title type='text'>गाय से सुक</title><content type='html'>आनन्द है गाय के साथ&lt;br /&gt;प्रातः आँख खुली तो साढे चार बजे थे.&lt;br /&gt;स्वभावतः ही स्वयं को देखा. शरीर में थकावट और आलस्य लगा. यदि गाय ना होती तो मैं फ़िरसे सो गया होता. अब और देरी हुईतो मेरी अनुराधा भूखी रह जायेगी.( गाय का नाम राधा, बाछी का नाम अनुराधा है. जब मेरे पास ५-७ गायें हों जायेंगी, तब शायद माँ-बेटी का एक ही नाम रह जाये. अभी तो दोनों अपने-अपने नाम सुनकर खुश होकर कान खङे करती हैं) &lt;br /&gt;उठा. अपनी लार दोनों आँखों में लगाई. अपने सोराईसिस के दाग पर लगाई. निवाये जलके साथ एक चम्मच अजवाईन  ली. शौच-मंजन से निवृत्त होकर गोशाला की तरफ़ गया. राधा..... नाम सुनकर ही राधा खङी हो गई.  अनुराधा दूध के लिये मचल ही रही है. अपनी रस्सी खुलते ही चौकङी भरते हुये सीधी थनों से मुँह लगा लिया. राधा भी तृप्त होने लगी. माँ-बेटी को कुछ देर अकेला छोङकर मैं गोबर उठाने लगा. ऊपर-ऊपर का गोबर (जिसमें धूल ना मिली हो) अलग से घोल बनाने वाली टब में डाला. शेष सारा गोबर अलग रखा, इसकी थेपङी बनेगी- आजकल रूपये की तीन बिकती है. &lt;br /&gt;हाथ धोकर गायका दलिया लाया. इसमें अजवाईन मिली है. गाय इसकी खूशबू से ही मस्त हो गई. वह खाने में मगन, और मैंने उसके दोनों पाँव पूँछ सहित नाणे से बाँधे. अनुराधा से थन छोङाकर उसे राधा के पास बाँधा. तभी राधा ने मूत्र किया, जिसे मैंने पहले से धोकर रक्खे बरतन में ले लिया. मूत्र की दो बूँद सिर पर, दो आँखों में और लगभग आधा गिलास पेट में लेकर बरतन को अलग रक्खा. हा्थ धोकर दूहने बैठा. गो-दूहासन में बाल्टी को दोनों घुटनों के बीच पकङकर दोनों हाथों से दूध दूहना अद्भुत सुख देता है. बाल्टी में धारकी आवाज ही मुझे बहुत आकर्षक लगती रही है, गत सप्ताह भरसे प्रत्यक्ष कर पा रहा हूँ....सौभाग्य की क्या सीमा! पाँच-सात मिनट में ही लगभग दो सेर दूध लेकर बाकी दूध अनुराधा के लिये छोङ देता हूँ. थन में चिपटी तीन जोंक खींच कर अलग करता हूँ, किन्तु राधा का एक थन कटा हुआ है. उसे देखकर फ़िरसे विचार आता है कि इसे कैसे बन्द किया जाये. दिनभर इस कटे थन से दूध झरता रहता है. देखने वाले सभी कहते हैं कि दो-तीन सेर दूध बेकार जा रहा है. मुझे इसका अलग सुख है.दूधकी नदियों वाली कहावत कमसेकम मेरे घरमें तो चरितार्थ ही है, पर फ़िरभी इसका ईलाज हो जाये, यह उपाय तो करना ही है. टाली की पत्तियां घिस कर ५ बार लगाई, पर झरते दूध में वह कब तक टिके? फ़िर पास ही अनुराधा भी तो है, जब-तब मौका मिलते ही मुँह मार देती है. और डाक्टर का कहना है कि अभी इस थन पर टांका भी नहीं लगाया जा सकता. ८-९ महीनों में जब थनसे दूध आना बन्द होगा, तब कुछ सोचा जा सकता है. ब्लागपर  कोई जानकार बन्धु इसका ईलाज बता सके तो मजा आ जाये! &lt;br /&gt;दूध निकालकर नाणा खोला, अनुराधा को भी. उसे दूध पीता देखना अलग सुख है. मगर मुझे तो अभी और भी आनन्द लेने हैं. दूध को ढक कर रसोई में रखा. गोमूत्र को छानकर बाहर दरवाजे पर रक्खा, और सूचना पट्ट पर लिख दिया-" जो मानते हैं, उसे जान लें. जो जानते हैं, उसे जी लें- तो सुख ही सुख है. .... कुछ जानते हैं, ज्यादा मानते हैं. जो जानते भी हैं, उसे मानते नहीं. जो मानते हैं, उसे जानते नहीं, तो सारी देह-यात्रा प्रश्न-समस्या और दुःख बन जाती है. जानना मानव का अधिकार है. जान लो तो सुख ही सुख." प्रातः ६ से ८ बजे तक गोमूत्र-पान करने वालों की सेवा का सुख मिल जाता है. पीपल की नीचे गोमूत्र का बर्तन और चार गिलास रख दिये, बस! और क्या करना है? अब लौटकर थोङा झाङू-पौंछा और स्नान करके गरम दूध का सेवन. आठ बजते बजते ब्लाग पर आकर आप सबसे बतियाने का सुख!.... बाकी कल.       साधक उम्मेदसिंह बैद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-8777184572333411210?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/8777184572333411210/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/8777184572333411210'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/8777184572333411210'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='गाय से सुक'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-7139027791348858205</id><published>2009-12-14T07:20:00.000-08:00</published><updated>2010-01-09T06:18:41.970-08:00</updated><title type='text'>सिंगुर प्रकरण-४</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;style type="text/css"&gt; @import url(http://beemp3.com/player/embed.css);&lt;/style&gt;&lt;table cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;TR&gt; &lt;TD WIDTH="16" style="background-image: url(http://beemp3.com/player/left-dkrow3.gif);background-repeat: repeat-y;border: 0;margin:0;"&gt;&lt;IMG style="padding:0;border:0;" SRC="http://beemp3.com/player/corner-topleft2.gif"/&gt;&lt;/TD&gt; &lt;TD style="background-image: url(http://beemp3.com/player/bkgnd-top2.gif);background-repeat: repeat-x;font-family: Arial, Helvetica, sans-serif;font-size: 11px;vertical-align: bottom;padding: 0;border: 0;margin:0;"&gt;A.R. Rahman - Jai Ho .mp3&lt;/TD&gt; &lt;TD WIDTH="16" style="background-image: url(http://beemp3.com/player/right-dkrow3.gif);background-repeat: repeat;border: 0; margin:0;"&gt;&lt;IMG style="padding:0;border:0;" SRC="http://beemp3.com/player/corner-topright2.gif"/&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/tr&gt;&lt;TR VALIGN="MIDDLE"&gt; &lt;TD WIDTH="16" style="width: 16px;background-image:url(http://beemp3.com/player/left-ltrow2.gif);"/&gt; &lt;TD style="background-image: url(http://beemp3.com/player/light2.gif);background-repeat: repeat;font-family: Arial, Helvetica, sans-serif;font-size: 11px;vertical-align: bottom;"&gt;&lt;embed class="beeplayer" wmode="transparent" style="height:24px;width:290px;" src="http://beemp3.com/player/player.swf" quality="high" bgcolor="#ffffff" width="290" height="24" align="middle" allowScriptAccess="sameDomain" type="application/x-shockwave-flash" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" 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0;margin:0;"&gt;Found at &lt;a href="http://beemp3.com/download.php?file=4135185&amp;song=Jai+Ho"&gt;bee mp3 search engine&lt;/a&gt;&lt;/TD&gt;&lt;TD WIDTH="16"&gt;&lt;IMG style="padding:0;border:0;" SRC="http://beemp3.com/player/corner-bottomright2.gif"&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/table&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_3260.html"&gt;सिंगुर&lt;/a&gt; ने सिर्फ़ समस्यायें ही दी हों ऐसा नहीं, समाधान भी बताया था. वैसे समस्या &lt;br /&gt;कभी अकेली होती ही नहीं, न ही समस्या पहले आती है. पहले होता है समाधान. &lt;br /&gt;यह प्रकृति का नियम, मानव अपने भ्रम के कारण नहीं देख पा रहा है. दूसरे शब्दों &lt;br /&gt;में यह भी कहा जा सकता है कि समस्या भ्रम, या भ्रम का परिणाम होता है, &lt;br /&gt;समस्या का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता. सिंगुर/टाटा या नैनो की समस्या भी इस &lt;br /&gt;भ्रम में से खङी हुई है कि एक लाख रुपयों में गाङी मिलने से भारत आर्थिक प्रगति&lt;br /&gt; करेगा,आम आदमी सुखी होगा. अब यह भ्रम तो इतना स्पष्ट है कि अनपढ आदमी&lt;br /&gt; को भी पता है कि गाङी सुख नहीं, सिर्फ़ सुविधा दे सकती है, और वर्तमान&lt;br /&gt; हालातों में तो गाङी हर तरह से दुविधा ही है. गलत विकास माडल के भुलावे में &lt;br /&gt;और दिखावे के चक्कर में बिना सोचे-समझे जैसे लोग कार-फ़्रिज़ लेते हैं, वैसे ही &lt;br /&gt;इनका टाटा की मंडली निर्माण करती है, सब भ्रममें चलता है. समाधान है समझ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाब हाजिर है यहाँ हर सवाल का देख.&lt;br /&gt;समस्या से आगे रहे समाधान नित देख.&lt;br /&gt;समाधान है देख,समस्या मानो कन्या.&lt;br /&gt;वर पहले से पैदा हुआ है करने धन्या .&lt;br /&gt;यह साधक कविराय सदा से ही हाजिर है.&lt;br /&gt;हर सवाल का जवाब पहले से हाजिर है. १५.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की पहचान है , त्याग-धर्म-आचार .&lt;br /&gt;आज हुआ विपरीत ही, इन्डिया का व्यवहार .&lt;br /&gt;इन्डिया का व्यवहार,अखरता आम-जनों को.&lt;br /&gt;पीङा देता जान-बूझकर राम-जनों को .&lt;br /&gt;सुन साधक  गीता-गायक की सही आन है.&lt;br /&gt;निश्चित जीते  धर्म, भारत की पहचान है . १८.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी भी विपरीत हो ,परिस्थिति सुन यार .&lt;br /&gt;पकङ के रखना राम को, होगा बेङा पार .&lt;br /&gt;होगा बेङा पार ,आस्था बनी रहेगी .&lt;br /&gt;सुख-शान्ति और , सक्रियता भी बनी रहेगी.&lt;br /&gt;कह साधक कविराय , राम की सदा जीत हो .&lt;br /&gt;परिस्थिति का क्या,कितनी भी विपरीत हो . १९.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भ्रमित व्यवस्था को बदलने प्रयत्न भी चल रहे हैं. कई&lt;br /&gt;लोग, सन्त-महापुरुष और संगठन भारत के अनुकूल तन्त्र &lt;br /&gt;बनाने में लगे हैं. देर-सबेर इस भ्रष्ट तन्त्र को समूल जाना ही &lt;br /&gt;है. अपने बोझ से भी टूटेगा एक दिन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिस्टम को खा जायेगी, सिंगुर की यह हाय&lt;br /&gt;पैसा, सत्ता, बाहुबल, करते सब अन्याय ।&lt;br /&gt;करते सब अन्याय, हड़प ली जमीन सारी&lt;br /&gt;लौटा नहीं सकते, कानून की है लाचारी ।&lt;br /&gt;कह साधक कवि, जल्दी बदलो इस कानून को&lt;br /&gt;पीड़ित जन की हाय लील जाये सिस्टम को ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिवर्तन-हित चल रहे , जाने कितने काम. &lt;br /&gt;अपने –अपने ढंग से,लगे हुये निष्काम.&lt;br /&gt;लगे हुये निष्काम,कि दिल में लगन एक है.&lt;br /&gt;विश्व-गुरु हो जल्दी भारत, अगन नेक है .&lt;br /&gt;कह साधक,यह तंत्र नहीं है भारत के हित . &lt;br /&gt;इसीलिये सब लगे हुये हैं परिवर्तन हित . २०.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घङा पाप का भर रहा, दुष्ट- तन्त्र का खूब .&lt;br /&gt;सुन्द-उपसुन्द ही लङरहे,आपस में ही खूब.&lt;br /&gt;आपस में ही खूब,न्याय-कानून की खिल्ली.&lt;br /&gt;उङा रही है खुल्लम-खुल्ला कबसे दिल्ली .&lt;br /&gt;कह साधक कवि ,समय आ गया न्याय का.&lt;br /&gt;दुष्ट-तन्त्र का देख, घङा भर गया पाप का.२९&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शासन और प्रशासन का , निकल गया है राम.&lt;br /&gt; न्याय और कानून भी जैसे बने हराम.&lt;br /&gt;ऐसे बने हराम, कि समझदार कोई भी.&lt;br /&gt; इनकी शरण में ना जायेगा यार कोई भी.&lt;br /&gt;कह साधक कवि,कैसे जाये यह दुःशासन .&lt;br /&gt;निज आचरण से लेके आओ धर्म का शासन .२५.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;म से मोदी-ममता-मार्क्स,सिंगुर देता अर्थ.&lt;br /&gt;नैनो के संग जुङ गये,भारत के गूढार्थ .&lt;br /&gt;भारत के गूढार्थ,कार-खेती की टक्कर, &lt;br /&gt;जीती कार और हारी खेती-उल्टा चक्कर. &lt;br /&gt;कह साधक कवि,टाटा ने क्या बुद्धि खो दी,&lt;br /&gt;कहता सिंगुर,म से समझो ममता- मोदी.२८. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोधन गजधन बाजिधन, और रतनधन खान&lt;br /&gt;जब आवे संतोष धन, सबधन धूरि समान ।&lt;br /&gt;सबधन धूरि समान आज नैनो छाई है&lt;br /&gt;धन की मौलिक परिभाषा ही शरमाई है।&lt;br /&gt; साधक चेतन पर हावी स्पन्दनशून्य मशीन&lt;br /&gt;मगर समझलें हे मानव सारे सुख गो आधीन ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय आगया देख लो,हो राक्षस का अन्त. &lt;br /&gt;प्रगट करो भारत स्वयं,अपना शौर्य अनन्त.&lt;br /&gt;अपना शौर्य अनन्त,सनातन-शाश्वत धारा.&lt;br /&gt; करो स्वयंको मुक्त, तोङ-दो मोह की कारा.&lt;br /&gt;कह साधक कविराय,उठो अब समय आ गया.&lt;br /&gt;हो राक्षस का अन्त,यार अब समय आ गया.३०.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-7139027791348858205?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/7139027791348858205/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7139027791348858205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7139027791348858205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html' title='सिंगुर प्रकरण-४'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-5376093242362371322</id><published>2009-12-14T07:03:00.000-08:00</published><updated>2009-12-14T07:04:26.097-08:00</updated><title type='text'>adhyayan-4</title><content type='html'>१४-१२-२००९ प्रातः ९ बजे.  आज घर को बन्द करना है, ताकि कल सुबह ५ बजे जयपुर के लिये निकल सकूँ. वापस लौटते २६ जनवरी हो जायेगी, तो सारा सामान धूल-गर्द से बचाने  का इन्तजाम करना है. ईशान कोण का छोटा कमरा पीपल के एकदम पास है, रोशनदान से बहुत धूल आती है. यदि धूल की आँधी चल जाये तो सारा सामान रेत के टीबे में दबा मिलता है. मन्दिर है, भगवान अपनी रक्षा के लिये मेरी सावधानी पर ही निर्भर करते हैं. भग्वान खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकते, इतनी सी बात पर मूलशंकर को गुस्सा आ गया, आगे जाकर उन्होंने ही दयानन्द बनकर आर्य समाज की स्थापना कर डाली. जबकि इसमें गुस्सा होने की कोई बात ही नहीं है. यह तो मानव की सर्वोच्चता और गरिमा का प्रमाण है. ’मैं’ है, तभी परमसत्ता है. मैं के बिना बिना परम सत्ता का प्रमाण कौन देगा?. मैं तो कहता हूँ कि परमसत्ता मेरे बिना नहीं, मैं उसके बिना नहीं. अब यह ’नहीं’ शब्द अस्तित्व में नहीं होता. है का अस्तित्व है, नहीं का नहीं.... एक कुडली का भाव बना है.&lt;br /&gt;है का ही अस्तित्व है, नहीं का नहीं मित्र.&lt;br /&gt;है को जान तो मिट गया, नहीं से बिगङा चित्र.&lt;br /&gt;नहीं से बिगङा चित्र, यही है दुःख-समस्या.&lt;br /&gt;है को जान तो मिट जाये भ्रम-दुःख-समस्या.&lt;br /&gt;यह साधक कवि सह-अस्तित्व का मर्म बताता.&lt;br /&gt;दुःख-समस्या नहीं, समझ से नित सुख आता.&lt;br /&gt;उस कमरे के रोशन्दानों को कार्टून के टूटे गत्ते लगाकर बन्द करना समय साध्य काम है. सारे कमरों पर ताला लगाने से पूर्व इधर-उधर रखा सामान ठीक जगह रखकर सुरक्षित करना है. जिस घङी में सप्ताह भर पूर्व सेल बदलवाया, वह फ़िर बन्द हो गई, उसके साथ और एक खराब टेबल घङी भी ठीक करवा कर जाऊँ, वापस लौटने तक खराब हुये सेलका क्लेम खतम ना हो जाये. सारे कलफ़ लगे कपङे आयरन करने हैं, बाज़ारके रेट तो काबू में ही नहीं आते.  सारा काम निपटाकर इस कम्प्युटर को भी खोलकर सहेजकर रखना होगा, लगभग डेढ माह तक अब लेपटोप ही काम आयेगा. भला हो आनन्द जी का, उनके एक मित्र से रिलायंस का डाटा कार्ड मिल गया, वरना मात्र ४०-५० दिनके लिये खरीदना पङता. आनन्द जी ने ब्रोड्बैंड का कनेक्शन देते समय यह साबित करने की कोशिश की, कि सरकारी आदमी असरकारी हो सकता है. मैंने उनकी ओफ़िसमें सबके बीच कहा था  &lt;br /&gt;" आप सरकारी हैं, अ-सरकारी कैसे हो सकते हैं."  और उन्होंने अपनी रिस्क पर मुझे डाटा कार्ड भी दिलवा दिया.! उनका असरकारी होना इस बात की पुष्टि है कि  भले सारी संस्थायें सङ-गल गई हों, मानव अभी भी ५१% सही है. हर मानव सबका भला करना ही चाहता है. हर मानव सही करना ही चाहता है. हर मानव चाहता कि उसका विश्वास किया जाय और उसे सबका विश्वास मिले. इस धरती को हर मानव बचाना चाहता ही है. आनन्द जी का सरल सहयोग शुभ भावों के प्रति श्रद्धा जगाता है.&lt;br /&gt;बगिया से अब जनवरी अन्त में ही वास्ता पङना है. इस बीच खूमारामजी-हनुमानजी इसकी सेवा का आनन्द लेंगे, मटर, पालक भी उनको ही मिलेगा. अच्छे व्यक्तिहैं, मेरा बहुत ध्यान रखा. हनुमानजी के हाथ की बनी बाजरे की रोटी का मिठास जीभ पर और सुगन्ध सांसों में बसी है.&lt;br /&gt;कल सुबह ५ बजे की बस से लगभग ११ बजे तक जयपुर पहुँचूँगा. जोगेश्वरजी पुरानी चौकी के पास मुझे लेने आयेंगे. उनके घरपर रहनेसे सुरेन्द्रजी से भी २-३ घंटा बात हो सकेगी, टिकट भी vip  कोटे से कन्फ़र्म हो जायेगा. सुरेन्द्रजी सौर-ऊर्जा वालों से मिलवा भी देंगे.  उनकी धर्म्पत्नी मनन चतुर्वेदी बङी जीवट वाली महिला हैं. ३०३५ अनाथ बच्चों को अपने घरमें अपने बच्चों की तरह रख कर पाल रही हैं. उनके स्वयं के बच्चे भी उसी आदर्श विद्या मन्दिरमें पढते हैं, जिसमें बाकी बच्चों के भी पढा रही हैं. किसी सरकारी काम से आज कोलकाता जा रही हैं फ़ओन आया कि एयरपोर्ट के पास कोई ढंगका होटल सुझा दूँ. मेरे घर में मेरे बिना रहने में संकोच कर रही हैं. मैंने श्रीमतीजी को बताया. अब चि.श्रेयाँश उनके स्वयं एयरपोर्ट से घर ले जायेगा. वैसे श्रेयाँश इतना व्यस्त रहता है, अक्सर कोलकाता से बाहर ही होता है, उससे बात करना भी मुश्किल अवसर सा होता है. अच्छा हुआ कि वह आज कोलकाता ही है, कल सुबह मुम्बई.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-5376093242362371322?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/5376093242362371322/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/adhyayan-4.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/5376093242362371322'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/5376093242362371322'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/adhyayan-4.html' title='adhyayan-4'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6424056539748330827</id><published>2009-12-13T08:26:00.000-08:00</published><updated>2009-12-13T08:27:41.358-08:00</updated><title type='text'>सिंगुर प्रकरण-३</title><content type='html'>ममता और बुद्धदेव दोनों को धत्ता बता कर टाटा चले गये गुजरात. &lt;br /&gt;२-३ हजार करोङ का नुक्सान हुआ बताते हैं. सब पैसे का खेल! टाटा &lt;br /&gt;को तो कोई फ़र्क नहीं पङा, परकिसान दोनों तरफ़ से गये. अब &lt;br /&gt;अधिगृहित जमीन भी वापस नहीं मिल सकती. कानून की कोई &lt;br /&gt;बाध्यता बताई.  वैसे मिल भी जाती जमीन  तो क्या फ़ायदा? अब &lt;br /&gt;खेतीलायक तो रही नहीं . सीमेंट-लोहे ने सब चौपट कर दिया. अब &lt;br /&gt;रोते रहो. वर्षों चलेगा रोना. पीढीयों चलेंगी कहानियाँ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाटा चले गये सिंगुर से,  रोते रह गये लोग.&lt;br /&gt;क्या कर लेगी राजनीती ,और क्या कर लेंगे लोग.&lt;br /&gt;क्या कर लेंगे लोग, विवश बैठे हैं सारे.&lt;br /&gt;बेढंगा है तंत्र ,मरेंगे सब बेचारे .&lt;br /&gt;कह साधक कविराय जब तलक चले तंत्र ये ,&lt;br /&gt;सिंगुर छोङ के अन्य जगह  को टाटा चले. १&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाटा ने दिखलाई है , नेता को औकात .&lt;br /&gt;दोनों  ताकते रह गये ,नैनो की बारात .&lt;br /&gt;नैनो की बारात  ,ना जाने कहाँ रुकेगी .&lt;br /&gt;कृषकों को झांसा देकर के पुनः ठगेगी .&lt;br /&gt;कह साधक कवि , कार –कृषक में मची लङाई . &lt;br /&gt;कृषि हारेगी,नैनो टाटा ने दिखलाई . ३.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताओं के हाथ ही खतरे में है देश ,&lt;br /&gt;सिंगुर ने है दे दिया , साफ-साफ संदेश.&lt;br /&gt;साफ-साफ संदेश,लुट रहे किसान  बेबस .&lt;br /&gt; जमीं गई-टाटा भी गये,तो किसका है बस ?&lt;br /&gt;कह साधक कवि ,नहीं दर्द कुछ नेताओं के .&lt;br /&gt;अच्छा है  अब ,जूते मारो नेताओं के . ९.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो होती सद्भावना,जनता से हो प्रेम .&lt;br /&gt;धर्म कभी ना त्यागते,स्वयं निभाते नेम .&lt;br /&gt;स्वयं निभाते नेम,तो जनता सिर-आँखों पर,&lt;br /&gt;नेताओं की बात मानती आगे होकर.&lt;br /&gt;कह साधक कविराय,नहीं हो स्वार्थ-साधना,&lt;br /&gt;जनता से हो प्रेम,जो होती सद्भावना .१६.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औरत के कारण घटे,महाभारत कई बार.&lt;br /&gt;दोहराई है बात ये सिंगुर में इसबार .&lt;br /&gt;सिंगुर में इसबार,भिङ गये वाम-पंथी .&lt;br /&gt;ममता से टकराये,बुद्धू वाम-पंथी .&lt;br /&gt;कह साधक राजा-बालक-तिरिया की शोहरत.&lt;br /&gt;समय साक्षी नहीं हारती कब्भी औरत . १७.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाम-पंथ ने कर लिया , पूँजी से गठ-जोङ ,&lt;br /&gt;टाटा को बुलवा लिया,ली किसान से होङ .&lt;br /&gt;ली किसान से होङ ,कृषि के बदले गाङी .&lt;br /&gt;नीति और सिद्धान्त ,जमीं में गहरी गाङी .&lt;br /&gt;कह साधक माया ना मिली ना राम पंथ को,&lt;br /&gt;सत्ता की ममता ने घेरा वाम-पंथ को . १०.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब कहावत बन गई, बाप बङा ना भैया,&lt;br /&gt;वाम-पंथ से पूछ लो सबसे बङा रूप्पैया .&lt;br /&gt;सबसे बङा रुप्पैया ,टाटा ने बतला दी ,&lt;br /&gt;दोनों दलों को एकसाथ औकात दिखा दी.&lt;br /&gt;कह साधक, जनता हाथी है,टाटा महावत.&lt;br /&gt;उठा सूँड से,पटक-पछाङे-खूब कहावत. ११.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंगुर प्रकरण-३&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6424056539748330827?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6424056539748330827/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6424056539748330827'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6424056539748330827'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_13.html' title='सिंगुर प्रकरण-३'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6748441401750999934</id><published>2009-12-12T21:27:00.000-08:00</published><updated>2009-12-12T21:29:00.094-08:00</updated><title type='text'>स्व का अध्ययन</title><content type='html'>१२-१२-२००९ शाम ४ बजे.  एक पुस्तक पूरी हुई, प्रभु की कृपा का स्पष्ट अनुभव कर पा रहा हूँ.  नेट पर कुल ८२ लेखों को पढकर उनपर ट्टिपणियाँ डाली, ५७ अपने आलेख पोस्ट किये, अपना सारा नित्यक्रम करते हुये यह सब सम्पन्न हुआ. इस बात की प्रसन्नता स्नेह, सुनीता, राकेशजी , गोविन्दाचार्य और बिमल जी के साथ बाँटी. खुशियाँ बाँटने से बढती हैं और परेशानी (मेरे पास नहीं है कोई परेशानी ) कम हो जाती है, इसका प्रमाण पाया. इसी सात तारीख की रात को ब्राड्बैंड का तार जुङा तो पहला फ़ोन भूषण जी को किया. यह सारी पोस्टिंग नईआशा naiashaa.com  पर डालकर  उनको खुश करना चाहता था. यह मौका बात में ही गुम हुआ, तो तत्काल अपना नया ब्लाग बनाया, कुछ मित्रों की मदद से टिप्स लिये, भडास, नुक्कड आदि पर पोस्ट डाले और उनका प्रतिसाद पाकर भूषण को भुलाया.  न भी भूले तो भी उन्होंने मेरा हित ही किया. सोमभाई  ठीक कहते हैं कि हर घटना जागृति में सहायक होती है. चार दिनों में इतना काम मनमें उत्साह भर रहा है कि अपनी वेब साईट भी मैं जल्द बना सकूँगा. भूषण के आसरे रहता तो अपने पांवों पर कभी खङा न हो पाता. भला हो भूषण का. इस पूरे प्रकरण पर एक कहानी बनाना मेरे लिये आनन्द का काम होगा. &lt;br /&gt;सिंगुर पर कभी पचासेक कुण्डलियां बनी थी. इस बीच यह कम्पुटर २-३ बार फ़ोरमेट हो गया, पहली बार ढूंढने से खाली डोकूमेन्ट मिला. सोच लिया कि अब वे रचनायें वापस नहीं मिलेंगी. मध्यस्थ दर्शन से परिचय के पूर्व बनी रचनायें हैं, अतः ज्यादा दुःख भी नहीं हुआ. पर यह तो कमाल हो गया. खोई वस्तु मिली, अवसर बना और उसे एडिट करके किताब का स्वरूप भी बन गया. इसे दोबारा देखकर और सजाया जा सकता है. कुछ गैप भी भर दिये जा सकते हैं.आनन्द है.&lt;br /&gt;अक्टूबर-नवम्बर में डा. पाठक को आश्वासन दिया था कि इसी वर्षमें एक पुस्तक पूरी करके आपको दूँगा. उस समय दिमाग में सीडी पर बजते गीतों पर पुस्तक बनाने का था. वह पुस्तक तो अभी चल ही रही है, बीचमें संयोगसे यह पुरानी लिखी रचनाओं की पुस्तक पूरी हुई.यह लगभग वैसा ही है जैसे काम करते-करते लघु-शंका निवृत्ति की आवश्यकता बने. मैं उठकर नीचे जाने की सोचूँ. नीचे जाना ही है, तो क्यों न बेसिन के नीचे रक्खी पानी की बाल्टी भी साथ ले जाऊं, बगिया में डाल देनी है. बगिया में पानी दालते समय पालक के पास उगते वृथा पौधे को भी उखाङ दिया. पालक का स्पर्ष मन में हर्ष भरता है. उअह पालक बिक्री के लिये नहीं है, बाज़ार में इस्का मौल-तोल नहीं होगा. मौल-तोल जहाँ भी होता है, वहाँ मूल्यों का निर्वाह नहीं होता. चाहे किसी शादी योग्य लङकी-लङके का मोल-तोल हो, या किसी के साथ वेब साईट बनाने- चलाने के लिये हो.... मोल-तोल में मन दुखता ही है. मूल्यांकन होना चाहिये, मूल्यांकन में न्याय है. मूल्यांकन उभयतृप्ति का कारण बनता है. इस पालक का मूल्यांकन यह है कि यह हमारे भोजन में गुणवत्ता और पौष्टिकता बढाता है. इस पालक को मैं इसी भाव से देखता हूँ, तो मेरे मन की प्रसन्नता पूरे अस्तित्व के साथ जुङकर पालक को भी हर्षित करती है. अपने सही मूल्यांकन से प्रसन्न पालक और अधिक पौष्टिक बनता है..... चलो थोङा पालक काटकर ऊपर ले चलता हूँ, ज्यूस बनाकर पी लेता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पालक तोङा, धोया और काटकर मिक्सी में ज्यूस बनाया. ज्यूस छाना. सारे उपकरण धोकर रक्खे. तत्काल धो लेने से कम पानी और कम समयमें काम हो जाता है. आलस्य करो, तो यही काम बोझ बन जाता है. तत्काल धोकर रखने से रसोई का मिजाज भी खिलखिलाता सा लगता है. कोई किसी भी समय मुझसे जावन-विद्या सीखने आये, और मेरी रसोई बेतरतीब देखे तो कैसा बुरा लगे! अपनी इसी आदत के कारण मेरा कोई काम पेंडिंग नहीं रहता... कामों की डिलीवरी बहुत तेज हो जाती है..... ज्यूस पीने बैठा.... अरे! मुझे तो पहले शंका-निवृत्त होना है! ... बस यही होता है मेरे साथ! काम कुछ करना था, हो जाता है कुछ! और तभी मुझे अस्थिर चित्त का माना जाता है. ठीक ही तो है. ज्यूस पीना भी ठीक, बगिया सींचना भी ठीक... मगर ज्यूस पीने से पूर्व शंका-निवृत्ति भी तो चाहिये!  हाँ, हो जाती है शंका-निवृत्ति. ऐसा कभी नहीं होता कि ज्यूस पीने के बाद  जाना पङा हो. अर्थात वह पुस्तक भी पूरी होगी, जिसके लिये पाठक जी को आश्वासन दे रक्खा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्व का अध्ययन!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6748441401750999934?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6748441401750999934/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2401.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6748441401750999934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6748441401750999934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2401.html' title='स्व का अध्ययन'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-1492556393539638997</id><published>2009-12-12T07:51:00.000-08:00</published><updated>2009-12-12T07:52:19.929-08:00</updated><title type='text'>सिंगुर प्रकरण-२</title><content type='html'>कोलकाता की सङकों पर अब चौबीस घंटा जाम रहने लगा है. औसतन दो व्यक्ति कार-बसों की चपेट में आकर जान गंवाते हैं. गाङियों की पार्किंग की समस्या है. मेम साहब बन-ठन के बाज़ार जाय, होटल या सिनेमा जाये, तो गाङी को २ – ३ किलोमीटर दूर पार्किंग को जगह मिलती है. एक घंटे बाद ही गाङी निकालना संघर्ष का काम होता है, तब तक आगे-पीछे, दांयें-बायें और गाङियाँ लग चुकी होती हैं. क्षमतासे  चार-पाँच गुना वाहन हैं सङकों पर. इससे बिगङने वाला पर्यावरण अलग... जीना मुहाल है. अब लखटकिया नैनो आयेगी! &lt;br /&gt;इतने मे घबरा गये,बारी है नैनो की.&lt;br /&gt;लाखों गाङी आ रही, हालत क्या हो सङ्क की.&lt;br /&gt;क्या हालत हो सङक की,सांसे घुट जायेगी.&lt;br /&gt;खुद टाटा को अपनी नानी याद आयेगी.&lt;br /&gt;कह साधक सीएनजी हो या तेल-पेट्रोल.&lt;br /&gt;निकल जायेगा इंसानों का तेल-पेट्रोल.&lt;br /&gt;पैसा-सत्ता-बाहुबल,राक्षसी गठ-जोङ .&lt;br /&gt;जनता को हैं लूटते, मचा-मचा कर होङ .&lt;br /&gt;मचा-मचा कर होङ ,करोङों वारे-न्यारे ,&lt;br /&gt;टाटा चार सौ करोङ, सिंगुर में हारे .&lt;br /&gt;पूछे साधक  हिसाब ,जो पलटा दे पत्ता .&lt;br /&gt;एक-लाख में कार ,गजब है-पैसा-सत्ता . १२&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाटा-बिरला-अम्बानी,पैसे का सब खेल .&lt;br /&gt;देश-समाज सब भाङ में,सत्ता से है मेल .&lt;br /&gt;सत्ता से है मेल,विदेशी-दुश्मनों संग, &lt;br /&gt;पींग बढाते हैं ऊँची,यह देश हुआ तंग .&lt;br /&gt;कह साधक,अब देश बचाये कोई बिरला.&lt;br /&gt;सब पैसे के पीछे पागल टाटा-बिरला . १३.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काली सडक पे दौडती, करती हवा को काला&lt;br /&gt;काल बन रहा आज फिर, टाटा नैनो वाला ।&lt;br /&gt;टाटा नैनो वाला, सड़कें जाम करेगा&lt;br /&gt;सस्ती कार, मगर कोई बोलो कहाँ रखेगा&lt;br /&gt;कह साधक कवि पलकों पर नैनो का झूला&lt;br /&gt;कार के पीछे बच्चों की किलकारी भूला ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैरेज में कारें भरी, नई डिजायन नित्य&lt;br /&gt;पलना ऊँचे टंग गया, बिसरा जीवन सत्य ।&lt;br /&gt;बिसरा जीवन सत्य, पदार्थ  प्रेमी मानव को&lt;br /&gt;यही दिशा प्रेरित करती आई दानव को ।&lt;br /&gt;कह साधक कवि, कारें जीती, बच्चे हारे&lt;br /&gt;नई डिजायन नित्य, भरी गैरेज में कारें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ममता कुर्सी मांगती,खेत का लेकर नाम.&lt;br /&gt;वाम-पंथ को भी मिले सत्ता संग आराम.&lt;br /&gt;सत्ता संग आराम,तो कैसे बात मान ले.&lt;br /&gt; टाटा भले चले जायें,चाहे जगत जान ले .&lt;br /&gt;कह साधक कवि, आज धरा संकल्प मांगती,&lt;br /&gt;बदलो यह दुश्चक्र, कि ममता कुर्सी मांगती.१४.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-1492556393539638997?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/1492556393539638997/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1492556393539638997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1492556393539638997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_12.html' title='सिंगुर प्रकरण-२'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-8014651293726995339</id><published>2009-12-11T18:21:00.000-08:00</published><updated>2009-12-11T18:23:13.521-08:00</updated><title type='text'>सिंगुर-१</title><content type='html'>गत नौ तारीख को नैनो के विरुद्ध उठते जनान्दोलन के समाचार पर ट्टिपणी करते समय सिंगुर याद आया. बंगाल से टाटा के कारोबार समेट कर गुजरात जाना पङा था. वाईब्रेन्ट गुजरात के धांसू मुख्यमंत्री ने कहा था कि राज्य में टाटा का आना जनता के हित में है. यही बात पहले वामपंथी बुद्ध देव कहते थे. जनता के व्यापक हित के नाम पर किसानों से उपजाऊ जमीन छीनकर टाटा को दी गई थी. ममता ने विरोध किया, किसान दोनों तरफ़ से पिटे-पिसे. तब कुण्डली बनी-&lt;br /&gt;जनता कहाँ है देखलो ,सिगुर कामैदान .&lt;br /&gt;राजनीटि- टाटा करे, जनता की ही हान .&lt;br /&gt;जनता की ही हान ,जमी दे दो या ना दो.&lt;br /&gt;मरना दोनों तरह ,किसी भी तरफ वोट दो.&lt;br /&gt;कह साधक कवि,रावण हो गया तंत्र देखलो, &lt;br /&gt;सिंगुर का मैदान ,कहाँ जनता है देखलो .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्टी गंगा बह रही, कृषक हुआ बेकार ,&lt;br /&gt;टाटा की खातिर बिछे,पलक-पाँवङे यार.&lt;br /&gt;पलक-पाँवङे यार,देश ऋषि-कृषकों का था .&lt;br /&gt;ऐसे दिन भारत में, यह किसने सोचा था ? &lt;br /&gt;जब साधक कवि नेता खुद बन गया लफ़ँगा,&lt;br /&gt;कृषक हुआ बेकार,बह रही उल्टी गंगा . ५. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुटते आये हैं सदा , खेती और किसान ,&lt;br /&gt;राजा ठाकुर ना रहे, ना ही जमीदार. &lt;br /&gt;ना ही जमीदार, आ गया प्रजातन्त्र भी ,&lt;br /&gt;प्रजा मगर नीचे है ,हावी रहा तंत्र ही .&lt;br /&gt;साधक आम आदमी सदा लुटते आयेहैं .&lt;br /&gt;खेती और किसान सदा पिटते आये हैं&lt;br /&gt;वाम-पंथ ने कर लिया,पूंजी से गठजोङ.&lt;br /&gt;टाटा को बुलवा लिया, ली किसान से होङ.&lt;br /&gt;ली किसान से होङ.कृषि के बदले गाङी.&lt;br /&gt;नीति और सिद्धान्त, जमीं में गहरी गाङी.&lt;br /&gt;कह साधक माया न मिली ना राम पंथ को.&lt;br /&gt;सत्ता की ममत्ता ने घेरा वाम-पंथ को.&lt;br /&gt;राजनीति ही कर रहे ममता हो या वाम. &lt;br /&gt;टाटा का भी देखलो निकल गया है राम.&lt;br /&gt;निकल गया है राम,ना देखा हित जनता का.&lt;br /&gt; कार जरूरी है,या जरूरी हित लोगों का ?&lt;br /&gt;कह साधक कविराय ,याद कर राम की नीति&lt;br /&gt;.राम छोङ कर भटक रही है राज की नीति. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो किसान खुद ना मरे ,वे सिंगुर में ढेर .&lt;br /&gt;हैं आश्रित इस तंत्र के , मरना देर-सबेर.&lt;br /&gt;मरना देर-सबेर ,तो डर किस बात का प्यारे . &lt;br /&gt;करके निश्चय पलट व्यवस्था, समय पुकारे.&lt;br /&gt;कह साधक कविराय,बदल लें किस्मत वे खुद .&lt;br /&gt;धरती की रक्षा करते वे,जो किसान खुद . ७.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ममता-टाटा-बुद्धदेव ,सबने लूटा खूब .&lt;br /&gt; सिंगुर बना है देश यह ,लूट मची भरपूर .&lt;br /&gt;लूट मची भरपूर ,अमरीका को बुलवाया . &lt;br /&gt;परमाणु-करार की खातिर फिर लुटवाया .&lt;br /&gt;कह साधक कविराय,मत धरो मन में समता .&lt;br /&gt;देश बचाओ मन में लेकर माँ की ममता. ८.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंगुर-१&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-8014651293726995339?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/8014651293726995339/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_3260.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/8014651293726995339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/8014651293726995339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_3260.html' title='सिंगुर-१'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-5157052684802027032</id><published>2009-12-11T17:44:00.000-08:00</published><updated>2009-12-11T17:45:11.158-08:00</updated><title type='text'>पाछल पहर, अऊत धन !</title><content type='html'>१२-१२-२००९ प्रातः ५ बजे= काफ़ी ठंड है. स्नान करके नहीं बैठा तो अंगुलियाँ बोर्ड पर आने की बजाय दस्तानों में ही दुबकी रहना पसन्द करती हैं. कोफ़ी बनाकर ली, तो जीभ पर प्रतिरोध सा लगता है.सूर्योदय से पूर्व कुछ भी लेना सही नहीं होता, यह बात किसी पुस्तक में होने की क्या जरूरत है, शरीर के संवेदन ही आगाह कर देते हैं. जानते-समझते हुये भी कोफ़ी का बनना? दो कारण तो स्पष्ट हैं. रात वाला दूध कहीं फ़ट ना जाय, इसलिये पहले ही काम ले लिया. दूसरा सर्दी. फ़्रिज होने की भी यही वजह होती है, कि कहीं कोई सीज खराब ना हो जाय. प्रकृति संग्रह को स्वीकार नहीं करती. रात दूध को जमा कर ही सोना ठीक रहता. बच गया, तो पीना पङा... पेट तो खराब होता ही है. शरीर भी प्रकृति की तरह थोङा झेल लेता है. अति ही हो जाय तो बिस्तर! तो क्या इस प्रकृति के लिये भी कोई बिस्तर की व्यवस्था है? सह-अस्तित्व का तकाजा तो यही है. सृष्टि-चक्र स्वयं में पूर्ण है, तोङ-फ़ोङ पूर्वक रिपेयर हो जाता है अपने-आप. इससे भी ज्यादा हो जाय तो शरीर को छोङ कर चल देता है जीवन. मानव सब कुछ जानते हुये भी ज्यादती करता है. भ्रम के कारण मूल्यों का मूल्याँकन नहीं होता... फ़्रिज, कुकर, ओवन, कार... प्रकृति-विरुद्ध कई आयोजन दे दिये हैं विज्ञान ने. मानव कहता है कि अब इनको झेलना मजबूरी हो गया है. रख लिया, तो  प्रयोग करना ही पङता है. यहाँ न गाङी, न फ़्रिज... कोई असुविधा नहीं. मुझे घर से बाहर जाना ही नहीं पङता. राशन वाला फ़ोनसे भेज देता है, सब्जी नीचे बगिया में-एकदम ताजा! फल वाला दरवाजे पर दे जाता है. न बाजार, न सिन्नेमा... समय ही कहाँ मिलता है! ... बात स्नान से शुरु हुई . कल रात खूमारामजी के मना करने पर भी हिम्मत करके स्नान कर लिया तो रोटी बहुत स्वादिष्ट लगी. सुबह-शाम का स्नान स्वस्थ रखता है. कल के स्नान में देरी हो गई थी... राजूदान जी आ गये, उनके साथ साहित्य चर्चा में समय का ध्यान ही ना रहा. बङी मजेदार रचनायें सुना गये. राजस्थानी के कवियों ने दोहा छन्द को खूब छाना है. कवि का नाम तो नहीं पर दोहे जीवन से भरे हुये.&lt;br /&gt;ओगण ऊपर गुण करै, दिल को मेट दरद्द.&lt;br /&gt;मार सकै मारै नहीं, वां को नाण्व मरद्द.१.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पातर प्रीत, पतंग रंग, तातै मद री तार.&lt;br /&gt;पाछल पहर अऊत धन, जात न लागै बार. २.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैल, अरि, धन, पंगरण, पतला भला ज एह.&lt;br /&gt;इतरा तो जाडा भला, रूँख, कङूंबो, मेह. ३.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेचां सुधरै पागङी,दामां सुधरै ब्याव. &lt;br /&gt;नारी सुधरै शीळ स्यूं, नर सुधरै नेठाव. ४&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथां परबत तोलता,दिन मं सौ-सौ बार.&lt;br /&gt;बै सांवत माटी मिल्या, भांडा घङै कुम्हार. ५.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्मन रोवै कूण कूं, हँसै ज कूण विचार.&lt;br /&gt;गया सु आवण का नहीं, रया सु जावणहार. ६&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वानां कैरी मित्रता, दोनूं ही बातां दुक्ख.&lt;br /&gt;खीज्यां काटै पांव नै, रीझ्यां चाटै मुक्ख. ७.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जळ, जोगी, आतस, अमल, तरूणी, तेग, तुरंग.&lt;br /&gt;इतरा हुवै न आपणां, भूपति, सिंह, भुजंग. ८.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नारी, क्यारी,सजण जण, विद्या,गान, किसांन.&lt;br /&gt; बार-बार संभाळिये, धान, पान, जुजमान. ९.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बङ बुगलां स्यूं बिगङै, बानर सूं बणराय. &lt;br /&gt;बंस सपूतां बावङै, कौम कपूतां जाय. १०.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिकण गांव मं च्यार नह, बणिक, बैद, जळ, न्याय.&lt;br /&gt;बसणो तो अलगो रयौ, रात रह्यो नहीं जाय. ११&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय तो लगा, सात बजने को आ रहे हैं. मन्दिर की आरती सुनाई दे रही है. बीचमें जाकर दूध लाया, झाङू किया, स्नान भी... मगर दोहे बहुत  मौजूं हैं. जीवन के गहरे अनुभवों का निचोङ भर दिया कवि ने एक-एक दोहे पर घंटों सत्संग हो सकता है. दूसरे दोहे की दूसरी पंक्ति का सच तो दुनियाँ का एक-एक आदमी भोग रहा है. ....पाछल पहर, अऊत धन जात न लागए बार.... पिछला पहर और गलत मार्ग से आया धन शीघ्र चला जाता है. ... सफ़लता और सुख की चाबियाँ हैं ये. जरूरी काम पहले पहर में करो, पिछले पहर में नहीं होगा. पिछले पहर को जाने में देर नहीं लगती. पिछला पहर आया ही क्यों? आलस्य और प्रमाद में होता है पिछला पहर! और गलत मार्ग से आया धन!... अमेरिका में मन्दी, अरब में दिवाला... और अपने आस-पास ऊगते नव-धनिक युवा... किसी के पास नहीं टिकता गलत धन. शोषण और ठगी से अमीरी भले आ जाय, दरिद्रता नहीं जाती. समृद्धि स्वावलम्बन में ही है. स्वावलम्बन अर्थात मानवेतर प्रकृति के साथ श्रम से किया गया उत्पादन.  नीचे बगिया में इतनी सब्जी होने वाली है, कि सारा मोहल्ला खाये, तब भी बच जाय. ... पाछल पहर अऊत धन, जात न लागै बार.... स्नेह होती तो उसके साथ इन दोहों पर सत्संग चलता, आनन्द आता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-5157052684802027032?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/5157052684802027032/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_11.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/5157052684802027032'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/5157052684802027032'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_11.html' title='पाछल पहर, अऊत धन !'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-7312966763208101868</id><published>2009-12-10T20:40:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T20:41:23.326-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम'/><title type='text'>विज्ञान-चर्चा !</title><content type='html'>अंधा नहीं होता प्रेम. प्रेम एक विशेष रस का स्राव करता है, शरीर की अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ ऐसा स्राव करती हैं कि प्रेमी सिर्फ़ अच्छा- अच्छा देख पाता है. नकारात्मक दिखना बन्द हो जाता है. वास्तवमें यही सही देखना है. अस्तित्वमें नकारात्मक कुछ है ही नहीं. अस्तित्व में सब कुछ सकारात्मक है, अच्छा है. जिनको नकारात्मक दिखता है, वे अंधे हैं. अब सओ अंधे मिलकर देख सकने वालेको अंधा समझ लें तो कौन क्या कहे. देखने वाला कितना ही समझाये कि सूरज है, धूप और रोशनी देता है, इस रोशनी में फ़ूल-पत्ते-पेङ-पहाङ-झरणें आदि दिखाई देते हैं, तो क्या अंधे मान जायेंगें?&lt;br /&gt;प्रेम सही का दर्शन है, प्रेम ही सच्ची दृष्टि.&lt;br /&gt;प्रेम को अंधा मत समझ, प्रेम से चलती सृष्टि.&lt;br /&gt;प्रेम से चलती स्रुष्टि, प्रभु द्वार जान लो.&lt;br /&gt;प्रेम बिना सब सून, प्रेम रवि-प्रकाश मान लो.&lt;br /&gt;कह साधक विज्ञान प्रेम को कैसे जाने?&lt;br /&gt;प्रेम सही का दर्शन है, अंधे ना मानें.&lt;br /&gt;वैसे विज्ञान-चर्चा में आपके लेख का होना चर्चा को सार्थकता देता है, धन्यवाद. मेरी प्रेम स्वीकारें- साधक उम्मेद. ०९९०३०९४५०८&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-7312966763208101868?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/7312966763208101868/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2774.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7312966763208101868'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7312966763208101868'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2774.html' title='विज्ञान-चर्चा !'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-954173207976971652</id><published>2009-12-10T19:12:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T19:13:23.341-08:00</updated><title type='text'>शादी की ३४वीं साल गिरह!</title><content type='html'>१०-१२-२००९ शाम = रोटी बनाते समय जरा सा असावधान हुआ, और अंगुली तवे से लग गई. तत्काल तीन खयाल एक साथ आये- &lt;br /&gt;१. बङा सावधान बनता है! लो , थोङा सा ब्लाग की तरफ़ ध्यान क्या गया, कि जला ली अंगुलि.&lt;br /&gt;२- स्नेह को कभी नहीं सुना कि खाना बनाते समय ऐसी कोई दुर्घटना हुई हो, वह ज्यादा सावधान है.&lt;br /&gt;३- जिस समय जो कर रहे हो ध्यान उसी तरफ़ रखो, वरना प्रकृति का नियम लागू ही है, समझो! &lt;br /&gt; बाबा कहते हैं कि जीना परिवारमें ही बनता है. सच है. अभी स्नेह होती तो साथ-साथ लिखते-पढते. साथ-साथ होनेमें कोई बाधा भी नहीं है. बस, स्नेह का सारा विस्तार कोलकाता में बन गया, और मैंने अपना विस्तार होने ही नहीं दिया. स्नेह के लिये कल्याण आश्रम की बैठकें हैं- जो मैंने ही शुरु कराई थी. उसका पीहर है, बेटे-बहू और बेटी है- सभी पूरे व्यस्त. न रहे स्नेह तो सब घरको ताला मारकर चले जायें... पीछेसे संघके कार्यकर्ता और प्रचारक आते हैं.... सबको स्नेह मिलता है, ताजा नाश्ता मिलता है, आग्रह सहित भोजन विश्राम मिलता है. शबरी की तरह राह निहारती है स्नेह- और आजके (इस शबरीके) राम बार-बार धन्य भी कर जाते हैं.  अपनी धुन में शबरी भूल ही गई है कि राम का काम सीता की सुध लेना है, और रावणी अनाचार को समाप्त करना है. यह शबरी तो राम के आतिथ्य में ही मगन हुई, सीता रोती रहे. &lt;br /&gt;११-१२- २००९.प्रातः ८ बजे. शादी की ३४वीं साल गिरह. स्नेहको प्रेम-संदेश भेजने का भी वक्त नहीं, सिर्फ़ सूख सा फोन कर दिया. वह इसी पोस्ट को उपहार मान ले तो ठीक रहे. वैसे कामना यह है कि अब हम दोनों साथ-साथ रहें. इस कामना में कार्य की अधिकता का बहाना नहीं, अध्ययन की  त्वरा का आग्रह है. सारा कार्य-व्यवहार जागृति-क्रममें सहायक होने लगा है. बगिया में शारीरिक श्रम हो या बङे घर में झाङू-पौंछा अथवा फिर इस कम्प्युटर पर बैठकर कहानी-कविता लिखना, सबका प्रवाह अन्दर की तरफ़ है. बाहर हेने वाले क्रिया-कलापों की दिशा अन्दर की तरफ़ हो जाये, यही तो साधना है. इसका प्रभाव भी स्पष्ट है. भारतजी की गालियाँ सुनने को मिली हों, सरदार शहर में सबका तिरस्क्कार मिला हो या चारों तरफ़ से मिल रही प्रशंसा... सब अध्ययन की वस्तु बन गये. समता बनी रही. स्वालम्बन सध जाये तो शिक्षा-संस्कारमें भागीदारी के अवसर तो बने ही पङे हैं. ब्लाग पर भी तो कमो-बेश यही चल रहा है. इस प्रयत्न में एक भी संभावित जीवन अपनी जागृति-यात्रा में आ सके तो काफ़ी है. और यह कार्य हम दोनों करें, साथ-साथ करें, साथ-साथ रहें, साथ-साथ जियें, साथ-साथ आनन्दित हों... .... साधक- उम्मेद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-954173207976971652?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/954173207976971652/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2171.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/954173207976971652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/954173207976971652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2171.html' title='शादी की ३४वीं साल गिरह!'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-1974007005346204076</id><published>2009-12-10T02:23:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T02:24:13.220-08:00</updated><title type='text'>सँवाद बने तो बात बने!</title><content type='html'>आज सुबह ही मुझे किसी मित्र ने सावधान किया कि मैं अपनीए ट्टिपणियों में किसी व्यक्ति का, किसी पोर्टल का या किसी वेब साईट का नामोल्लेख ना करूँ.  बताया कि इससे वे नाराज हो सकते हैं. पहले तो मैं चौंका, कि लेखक या संस्थायें क्या इतनी असहिष्णु हो सकती हैं कि नामोल्लेख मात्र से भङक जाय, भले वे जमके किसी के भी कपङे भरे बाज़ार खींच दे रहे हैं!  और अभी तो हम्माम में सभी नंगे वाली हालत है, सब समझते हैं, सब जानते हैं... फ़िरभी यह पर्दादारी! यही दुर्भाग्य है भारत का ( भूषण का नहीं ) . कथनी-करनी भेद ने भारत को ( फ़िर भूषण याद आये!) कहीं का नहीं छोङा.  खैर, अभी बात इतनी सी है कि अभी –अभी य्क आलेख पढा है. बाबरी विध्वंस का मूल जिम्मा नेहरू-गाँधी वंश समेत राजीव गाँधी पर दिया है लेखक ने. बहुत शानदार समीक्षा है, लेकिन फ़िरभी समाधान तो कहीं नहीं. समाधान एकपक्षीय नहीं होता, सार्वभौमिक होता है. क्या राम-मन्दिर समस्या का सार्वभौमिक समाधान संभव है?  क्या हर पक्ष को मंजूर हो सकने वाला कोई प्रस्ताव आजके ५०० या १००० साल बाद भी बन सकता है? या फ़िर इस प्रश्न को इस प्रकार रखा जाय कि दोनों समुदाय अपने-अपने इतिहास-बोध से छुटकारा पा सकते हैं?  क्या दोनों समुयाय अपनी-अपनी पांथिक मान्यताओं से ऊपर उठ सकते हैं?... बात किसी एक के मानने से नहीं बनेगी. बात दोनों की है. बात दोनों के साथ-साथ होने की है. बिल्कुल वैसे ही जैसे गुलाब का फ़ूल काँटों के साथ है. न फ़ूल शिकायत करता है, न काँटा उसे परेशान करता है. बल्कि कभी किसी राजनेता ने फ़ूलको भङकाने की कोशिश की; उसे यह बताने की कोशिश की कि तुम्हारी सुन्दरता के साथ बेमेल भद्दा काँटा कहाँ से आ गया, चलो इसे हटा देते हैं; तो फ़ूल इसका विरोध करेगा. फ़ूल ही क्यों, दोनों एक साथ विरोध करेंगे- काँटा और फ़ूल. क्योंकि दोनों साथ हैं.   अब कोई इस उदाहरण से अपनी तुलना करके स्वयं को काँटा मानकर भङक जाय तो कोई क्या करले. बात साथ-साथ होने की चल रही है. न तो काँटा, न तो फ़ूलकी. काँटा और फ़ूल एक दूसरे को अलग जानते ही नहीं. प्रकृति के नियमानुसार साथ हैं. बस हैं.   तो क्या ऐसा कोई प्रस्ताव बन सकता है?&lt;br /&gt;मैंने लेखक से इस कुण्डली में यही पूछा है, कि उसके नाम के साथ जो शुक्ल जुङा है, उसके दर्शन तो उसके आलेख में नहीं हैं. नजर बिल्कुल सही है. सारी बातों को आर-पार देख पा रही है, पर शुक्ल वाला भाग अनछुआ क्यों रह गया दोस्त! क्योंकि भ्रमकी स्याही जो पुती है. &lt;br /&gt;सही नजर है प्रेमकी, पर शुक्ल कहाँ है दोस्त!&lt;br /&gt;स्याही भ्रम की है पुती, दिखता केवल गोश्त.&lt;br /&gt;दिखता केवल गोश्त, ये जीवन है अनदेखा.&lt;br /&gt;तभी समस्या, समाधान का मुँह ना देखा.&lt;br /&gt;कह साधक कवि नजर टिकाओ राम-तत्व पर.&lt;br /&gt;वहीं शुक्ल है दोस्त! प्रेम की सही जहाँ नजर.&lt;br /&gt; नाम तो ठीक मगर प्रेम को भी ठीक से नहीं जाना.  अब मैं क्या करूँ.. नाम तो आता ही है. प्रेम न आये... तो क्या आये? पहले भी जितना लिखा सब लेखकों के लिये और स्वयं अपने लिये लिखा. लगता है कि लेखक अपनी पोस्ट देकर उसपर आई प्रतिक्रियायें नहीं देखते. जिसने मुझे टोका, दूसरों के लिये टोका. अपने यश पर आँच  आती हो तो हर कोई वन्त बन जाता है. मेरा स्वयं का अनुभव भी यही है. किसी को भारत का भूषण बताना चाहा तो इसी बात पर भङक गये, कि मैं भारत भूषण नहीं हूँ. अब उनके लिये भी ऐसा की कोई आलेख बनाना पङेगा. आखिर सँवाद तो बनाना ही है. सँवाद बनाना है, क्यों कि सारा समाधान संवाद से ही बनता है. समझ सँवाद से बनती है. वरना तो सारा विवाद है. वाद वही जो सँवाद बनाये. सँवाद बने तो बात बने. सँवाद बने, सही समझ का सँवाद बने तो संसद, वरना दल-दल. सँवाद बने तो कोप, वरना नो होप. सँवाद बने तो धरा स्वर्ग, वरना.....     ..... साधक-उम्मेद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-1974007005346204076?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/1974007005346204076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_6374.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1974007005346204076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1974007005346204076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_6374.html' title='सँवाद बने तो बात बने!'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6455125071136656989</id><published>2009-12-10T00:12:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T00:14:29.755-08:00</updated><title type='text'>समझो धरती के दर्द को !</title><content type='html'>विकसित देश धरती के दर्द को नहीं समझ सकते. कारण भी स्पष्ट है. उनके जीने का ढंग ही प्रकृति-विरोधी है. उनका दर्शन कहता है कि अस्तित्व परस्पर विरोध पर टिका है, जबकि अस्तित्व स्वयं ही सह-अस्तित्व है. प्रकृति में सहयोग है, न कि विरोध. सारी कायनात परस्पर सहयोगी है, सिवाय मानव के.... सिवाय भ्रमित मानव के.  पश्चिम के पास वह भाषा ही नहीं है जो जीवन को समझ सके, व्याख्यायित कर सके. धरती का दर्द भारत समझता है, (इंडिया नहीं, वह तो पश्चिम की ही भौंडी नकल मात्र है ), इसीलिये भारत ने विकास के इस माडल को नकार दिया है. नैनो का साणंद मे विरोध संकेत है, चेतावनी है सारे तन्त्र को जो विकास के पश्चिमी माडल का विकल्प सुनना ही नहीं चाहते. पहले सिंगुर से भगाया, अब साणण्द में भी प्रतिरोध का स्वर उठने लगा है.&lt;br /&gt;साणंद में भी हो गया, नैनो का प्रतिरोध.&lt;br /&gt;समझ गई जनता स्वयं,तभी हुआ गतिरोध. &lt;br /&gt;हुआ तीव्र प्रतिरोध, कि पर्यावरण बचाने.&lt;br /&gt;कार्बन उत्सर्जन से धरती माँ को बचाने.&lt;br /&gt;साधक इस विकास माडल का अन्त हो गया.&lt;br /&gt;नैनो का प्रतिरोध साणंद में भी हो गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सिंगुर प्रकरण पर पचासेक कुण्डलियाँ लिखी थी. यब मैं कोलकाता में था, वहाँ के स्पन्दन महसूस कर पाता हूँ. अभी राजस्थान के इस छोटे से कस्बेमें बैठा वही स्पन्दन अनुभव कर रहा हूँ. यदि मशीन फ़ोर्मेट करते समय वे कुण्ड्लियाँ नष्ट ना हो गई होंगी, तो आप पाठकों/दर्शकों को मिल जायेगी. अभी इतना ही.... साधक उम्मेद.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6455125071136656989?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6455125071136656989/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_10.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6455125071136656989'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6455125071136656989'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_10.html' title='समझो धरती के दर्द को !'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6386902500649857168</id><published>2009-12-09T16:42:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T16:43:16.687-08:00</updated><title type='text'>बुद्धिजीवी.</title><content type='html'>विस्फ़ोट पर संजयजी संतोष भारतीय पर अपनी भङास निकाल रहे हैं.  संतोष भारतीय एक पत्रिका चलाते हैं- चौथी दुनियाँ. चौथी दुनियाँ में छपे एक आलेख में सांसदों को नपुंसक बता दिया गया. संसद में चौथी दुनियाँ के इस आलेख पर खूब हो-हल्ला मचा. संजयजी की कलम सरकारी सेवा में व्यस्त- सोनियाजी की खूब तारीफ़ कर रही है, विस्फ़ोट देख लें. और संतोष भारतीय के साथ पुरानी अदावत. तो एक तीर से दो शिकार करते हुये संजयजी ने इस मुद्दे को लपक लिया. वैसे राजनीतीज्ञों का क्या अपमान! ( और क्या मान!) वे इस सबसे ऊपर उठ गये हैं. मगर संजयजी उछल पङे. शब्दों के तीर  चले- शब्द शूर तो हैं ही.... धुनी भी हैं. जिसके पीछे पङ जायें, उसकी बखिया उधेङना क्या बङी बात है. &lt;br /&gt;लेकिन प्रिय संजय जी! इससे होगा क्या यार? ... विस्फ़ोटों से टूटता है, बनता कुछ नहीं. कलम कुछ बनाये, तो बात बने. संतोष भारतीय ने जो किया, वही आपने कर दिया- दोनों बराबर. दोनों शब्दों का व्यापार कर रहे हैं, और शब्द व्यापारकी वस्तु नहीं होते. आज तो शब्दका व्यापार ही सबसे बङा व्यापार बन गया है. साधु-सन्त, पूरी शिक्षा व्यवस्था, पूरा राजतन्त्र, लेखक-विचारक .... सभी शब्द-व्यापार में लगे हैं. एक भिखारी शब्द से रोटी कमाता है- और सन्त भी.... सोचकर देखें... दरिद्रता की पराकाष्ठा हो गई. भाषा मानव की श्रेष्ठता का प्रतीक है या निकृष्टता का! भाषा मानव- मानव के साथ व्यवहार का माध्यम है, उसको परम्पराने आजीविका का माध्यम बना दिया! यह आजीविका क्या जीने भी दे रही है? प्रतीक में कहूँ तो सरस्वती और लक्ष्मी एक ही पालेमें समा गई, क्योंकि विष्णु सो गये. विवेक सो गया. विवेक शून्य कार्य-व्यवहार सुख कैसे देंगे? पूरी मानव जाति दुःखों और समस्याओं के अनवरत चक्र में फ़ंस गई है, विचारें. वैसे एक त्वरित कुण्डली दोनों के भेजी है, आप भी आनन्द लें- साधक उम्मेद.&lt;br /&gt;बुद्धिजीवी कर रहे शब्दों का व्यापार.&lt;br /&gt;प्रतिस्पर्द्धा है मीडीया, तो भाषा बाज़ार.&lt;br /&gt;भाषा हो व्यापार, संस्कृति हो खड्डे में.&lt;br /&gt;संतोष और भारतीय दोनों गड्ढे में&lt;br /&gt;कह साधक जीवन को बेचे बुद्धिजीवी.&lt;br /&gt;शब्दों का व्यापार कर रहे बुद्धिजीवी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6386902500649857168?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6386902500649857168/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6386902500649857168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6386902500649857168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html' title='बुद्धिजीवी.'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-2567694327266181051</id><published>2009-12-08T05:26:00.000-08:00</published><updated>2009-12-08T05:30:50.408-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शर्म'/><title type='text'>शर्म सार क्यों ?</title><content type='html'>6 दिसम्बर को आनद पाठक ने मेल पर एक कविता भेजी. उनको उत्तर लिखा है, आप भी देखिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; माना आपने भावों से भरकर लिखा है खूब.&lt;br /&gt;   मगर क्या करें कुँये-भंगमें रहा जमाना डूब.&lt;br /&gt;   रहा जमाना डूब, परस्पर घृणा बढाते.&lt;br /&gt;   देश-धर्म-भाषा-टुकङों में इसे बटाते.&lt;br /&gt;   कह साधक आनन्द बढाया मेरा आपने.&lt;br /&gt;   भाव भरे पर समाधान ना दिया आपने.१.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;   राजनीति पर नहीं राज्यनीति पर हो आनन्द.&lt;br /&gt;   समझ बने तो हर घटना देगी निश्चित आनन्द.&lt;br /&gt;   निश्चित है आनन्द, जाँचकर देखो भाई.&lt;br /&gt;   जीवन-विद्या अपनाओ, सब मिलकर भाई.&lt;br /&gt;   कह साधक कवि उठा भरोसा धर्म-नीति पर.&lt;br /&gt;   शिक्षा-अर्थनीति और टूटा राजनीति पर.&lt;br /&gt;यह थी उनकी कविता और भूमिका----&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt; इन्सानियत शर्मसार दिवस के रूप में मनायेगा.लाश गिन-गिन संसद की&lt;br /&gt;सीढ़िया चढ़ते लोग..लिब्राहम रिपोर्ट में इल्जाम सब पर ,मुजरिम कोई&lt;br /&gt;नही......&lt;br /&gt;जले पर नमक यह कि इस घटना पर एक श्वेत-पत्र लाने की बात हुई थी....शायद&lt;br /&gt;.उन्हे मालूम नहीं....इतिहास के काले पन्नों से श्वेत-पत्र नहीं लिखा&lt;br /&gt;जाता..&lt;br /&gt;अयोध्या बाबरी मस्जिद प्रकरण पर हुए दंगे पर  उत्पन्न एक सहज&lt;br /&gt;आक्रोश.....उस समय लिखी गई एक सहज कविता....]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                               एक कविता :श्वेत-पत्र पर खून की छींटे....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्वेतपत्र पर खून की छींटे मिट न सकेंगे&lt;br /&gt;चाहे जितना तथ्य जुटा लो टिक न सकेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               सरयू की लहरें साक्षी हैं रघुकुल रीति जहाँ की&lt;br /&gt;                 प्राण जाए पर वचन न जाए ऐसी बात कहाँ थी&lt;br /&gt;               एक ईंट क्या ढही! हजारों ढही आस्था  मन की&lt;br /&gt;               पूछ रहे हैं सिकता कण,रक्त-रंजित धार किधर की??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिध्दों के घर शान्ति कबूतर टिक न सकेंगे&lt;br /&gt;श्वेत-पत्र पर खून के .....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               मन्दिर-मस्जिद नहीं बने हैं ईंटे-पत्थर-गारों से&lt;br /&gt;               ईश्वर कभी नहीं बँट सकता खंजर और कटारों से&lt;br /&gt;               मन की श्रध्दा अगर प्रबल हो,पत्थर भी शिवालय है&lt;br /&gt;               धर्म कभी नहीं सिंच सकता नर-रक्त की  धारों से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंगड़ी टांगे बहुत दूर तक चल न सकेंगे&lt;br /&gt;श्वेत-पत्र पर खून के.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               जली बस्तियाँ ,टूटे चूल्हे ,जलती लाश तबाही  देखा&lt;br /&gt;               निर्दोष बिलखते बच्चों को अब बोलो कौन गवाही देगा?&lt;br /&gt;               शब्दों के आश्वासन से तो सूनी माँग नहीं भर सकती&lt;br /&gt;               राखी वाले हाथ कटे हैं  बोलो कौन सफ़ाई देगा ??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरोपें और प्रत्यारोपें बिक न सकेंगे&lt;br /&gt;श्वेत-पत्र पर खून के....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               श्वेत-पत्र   में तथ्य नहीं ,इतिहास  नहीं, हिसाब चाहिए&lt;br /&gt;               किस-किस ने मिलकर किया हमे विश्वासघात जवाब चाहिए&lt;br /&gt;               हम गूँगी पीढ़ी नहीं कि असमय काल-पात्र में दफ़न हो गये&lt;br /&gt;               छिनी अस्मिता रोटी जिनकी ,उनको भी इंसाफ़  चाहिए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-2567694327266181051?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/2567694327266181051/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_8122.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/2567694327266181051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/2567694327266181051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_8122.html' title='शर्म सार क्यों ?'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-1556951867083048355</id><published>2009-12-08T00:54:00.000-08:00</published><updated>2009-12-08T01:00:27.424-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रम'/><title type='text'>जागृति</title><content type='html'>जीवन विद्या से परिचयके पूर्व भी मैं गीत-कुण्डलियां आदि लिखा करता था. आनेके बाद विचारों को जैसे सार्थकता मिल गई. देखिये, दोनोंका अन्तर..........&lt;strong&gt;चाहत&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;हर मानव की कामना, हो उसका विस्तार.&lt;br /&gt;वित्त-पुत्र और यश की, कामना का यह सार.&lt;br /&gt;कामना का है सार, सदा यह रहे अधूरी.&lt;br /&gt;चुक जाती है देह, कामना हो ना पूरी.&lt;br /&gt;कह साधक कवि, बात हो सुख या समाधान की.&lt;br /&gt;समझ का हो विस्तार, कामना हर मानव की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबके मन में बस रही, सुख पाने की चाह.&lt;br /&gt;नाम कमाने की मगर, काँटों भरी है राह.&lt;br /&gt;काँटों भरी है राह, मंजिलों पर भी मुश्किल.&lt;br /&gt;सुविधा में सुख नहीं, परेशां ही रहता दिल.&lt;br /&gt;कह साधक कवि, दुविधा ही चलती है मनमें&lt;br /&gt;सुख पाने की चाह, अधूरी सबके मनमें. २.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो चाहा सो ना मिला, मिला तो अनायास.&lt;br /&gt;फ़िरभी कभी ना छोङते, कुछ पाने का प्रयास.&lt;br /&gt;सुख पाने का प्रयास, छूटता है कब किससे?&lt;br /&gt;लाखों हारे, मगर ना आता-जाता इससे.&lt;br /&gt;कह साधक कवि, छोटा हो गया जो पाया सो.&lt;br /&gt;मिला तो अनायास, ना मिला जो चाहा सो.३.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले के रचना&lt;br /&gt;संस्कृति रथ के चक्र दो, नारी पुरुष समान&lt;br /&gt;अपनी अपनी प्रकृति से, अपना अपना स्थान ।&lt;br /&gt;अपना अपना स्थान, कौन लघु कौन बड़ा है&lt;br /&gt;आजीवन कर्तव्य चक्र सुविशाल पड़ा है ।&lt;br /&gt;कह ’साधक’ अधिकार भाव से पनपे विकृति&lt;br /&gt;नारी-पुरुष संघर्ष नहीं भारत की संस्कृति ॥७५॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;और अब क्या कह रहा हूँ, वह भी सुनलें&lt;/strong&gt;-&lt;br /&gt;इच्छा-विचार-आशायें, सबका एक ही हाल.&lt;br /&gt;भ्रम तो भ्रम है क्या करूँ, था ऐसा ही हाल.&lt;br /&gt;ऐसा ही था हाल, रही मन ही मन उलझन.&lt;br /&gt;देह भाव में जिया, ना समझा क्या है जीवन.&lt;br /&gt;यह साधक कवि अब जाना जीवन की भाषा.&lt;br /&gt;भ्रम से निकली मेरी इच्छा विचार आशा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-1556951867083048355?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/1556951867083048355/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_6913.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1556951867083048355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1556951867083048355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_6913.html' title='जागृति'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6918299878491957796</id><published>2009-12-08T00:50:00.000-08:00</published><updated>2009-12-08T00:51:26.906-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='्चाहत'/><title type='text'>चाहत</title><content type='html'>मानव मात्र की चाहत  कुछ और है- फल-परिणाम और.&lt;br /&gt;इस दुविधा के पीछे सही समझ का अभाव ही मुख्य कारण है.&lt;br /&gt;मानव देह और जीवन का योग है.&lt;br /&gt;मानव की सारी कार्य योजना  और व्यवहार &lt;br /&gt;देह को केन्द्र  में रखकर चलते हैं, &lt;br /&gt;जीवन चूक ही जाता है.&lt;br /&gt;मानव का विज्ञान-  मूलतः जीवन का विज्ञान है.&lt;br /&gt;चाहतों के पूरा होने का आधार है- जीवन का ज्ञान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४- चाहत&lt;br /&gt;आओ बन्धुओं बात करें कुछ मानव के विज्ञान की.&lt;br /&gt;समझो और समझाओ सबको बातें जीवन ज्ञान की.&lt;br /&gt;सही बात को जान,  सही बात को मान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तन-मन स्वस्थ रहे और समृद्धि हो नित परिवार में.&lt;br /&gt;सम्बन्धों में तृप्ति और पहचान हो सही समाज में.&lt;br /&gt;सब प्रश्नों का समाधान पा जाऊँ केवल ज्ञान में.&lt;br /&gt;यह सारी चाहत मानव की, पूरी हो संज्ञान में.&lt;br /&gt;सही कार्य-व्यवहार से, बनती राहें सरल सुजान की.&lt;br /&gt;समझो और समझाओ सबको बातें जीवन ज्ञान की.&lt;br /&gt;सही बात को जान,  सही बात को मान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द शोर बन गये, अर्थ और वस्तु गायब हो गये.&lt;br /&gt;कथनी-करनी भेद कहानी-किस्से घर-घर हो गये.&lt;br /&gt;राह खो गई मानवता की, नीति-नियम सब सो गये.&lt;br /&gt;राह दिखाई नागराज ने, बाबा सबके हो गये.&lt;br /&gt;मध्यस्थ-दर्शन को जीना, राहें सरल-सुजान की.&lt;br /&gt;समझो और समझाओ सबको बातें जीवन ज्ञान की.&lt;br /&gt;सही बात को जान,  सही बात को मान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज-नीति या धर्म-नीति सारे अनीति में डोलते.&lt;br /&gt;शिक्षा और समाज-नीति के तारे गर्दिश खो गये.&lt;br /&gt;मानव को पशु बना दिया विज्ञान ने कितने प्रश्न दिये.&lt;br /&gt;आध्यामिक धारा में आकर  रहस्य गहरे हो गये.&lt;br /&gt;इस दुविधा में राह बताई बाबा ने संज्ञान की.&lt;br /&gt;समझो और समझाओ सबको बातें जीवन ज्ञान की.&lt;br /&gt;सही बात को जान,  सही बात को मान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूल्य-चरित्र और नैतिकता आचरण की सीमा रेखा है.&lt;br /&gt;कार्य और व्यवहार में पूरी मानवता को देखा है.&lt;br /&gt;सुख-शान्ति-सन्तोष-आनन्द का स्वप्न सभी ने देखा है&lt;br /&gt;स्वप्न धरा पर उतरें यह दर्शन की सीमा रेखा है.&lt;br /&gt;टुकङे-टुकङे नहीं, बात यह सार्वभौम सिद्धान्त की.&lt;br /&gt;समझो और समझाओ सबको बातें जीवन ज्ञान की.&lt;br /&gt;सही बात को जान,  सही बात को मान.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6918299878491957796?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6918299878491957796/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_4985.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6918299878491957796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6918299878491957796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_4985.html' title='चाहत'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-3336652384407183186</id><published>2009-12-08T00:44:00.000-08:00</published><updated>2009-12-08T00:47:15.395-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्ञान'/><title type='text'>चार  अवसता</title><content type='html'>जानने का विषय  प्रकृति में चार अवस्थायें,&lt;br /&gt;प्रकृति में स्थित प्रत्येक इकाई का व्यापक से सम्बन्ध,&lt;br /&gt;व्यापक में डूबे-भीगे –घिरे होना,&lt;br /&gt;स्वयं में व्यवस्था और बङी व्यवस्था में भागीदारी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस व्यवस्था को जानना ही स्वयं व्यवस्था को मानना है.&lt;br /&gt;यही सच्चा ज्ञान है.&lt;br /&gt;सही समझ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार अवस्था&lt;br /&gt;आओ साथियों समझ बढायें, जानें प्रकृति की भाषा.&lt;br /&gt;समझें और समझायें, क्या होते विचार-इच्छा-आशा.&lt;br /&gt;चार अवस्था जान, यही है सच्चा ज्ञान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पदार्थावस्था पूर्ण हुई तो, आनन्दोत्सव मच गया.&lt;br /&gt;आनन्द और उत्साह पूर्वक, पदार्थ आगे बढ गया.&lt;br /&gt;घटना नई घट गई, भौतिक-रासायनिक क्रियाओं से&lt;br /&gt;प्राणावस्था प्रकट हो गई, स्वांस- क्रिया की राहों से.&lt;br /&gt;होने से पोषण तक आई, प्रकृति की सुन्दर भाषा.&lt;br /&gt;समझें और समझायें, क्या होते विचार-इच्छा-आशा.&lt;br /&gt;चार अवस्था जान, यही है सच्चा ज्ञान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; जीवन पाया पर  ना जाना, जीवन का क्या लक्ष्य है&lt;br /&gt;मानव सबसे ऊँचा माना, मानव के सब भक्ष्य हैं.&lt;br /&gt;भक्ष्य नहीं, सुन मानव प्यारे, तीनों तेरे रक्ष्य हैं.&lt;br /&gt;प्रयोजन को समझो मानव, यही तुम्हारा लक्ष्य है.&lt;br /&gt;स्वार्थ-भाव पशु-राक्षस पद है, देना देवों की भाषा.&lt;br /&gt;समझें और समझायें, क्या होते विचार-इच्छा-आशा.&lt;br /&gt;चार अवस्था जान, यही है सच्चा ज्ञान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पल-पल उत्सव, हर-पल आनन्दों की शुभ बरषात है.&lt;br /&gt;नित्य नई घटनाओं का होता पल-पल रोमाँच है.&lt;br /&gt;कल-कल झरने, स्पर्श हवा का, तितली संग रोमांस है&lt;br /&gt;फूलों पर गुंजन भंवरों का, बगिया भरी सुवास है.&lt;br /&gt;खिली-प्रकृति सुना रही है, सबको जीवन की भाषा.&lt;br /&gt;समझें और समझायें, क्या होते विचार-इच्छा-आशा.&lt;br /&gt;चार अवस्था जान, यही है सच्चा ज्ञान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन और प्राण की चर्चा, बहलाती-उलझाती है.&lt;br /&gt;प्राणावस्था-जीवावस्था विकास-क्रम की थाती है.&lt;br /&gt;जङ-चेतन-मय चार अवस्था, जैसे नूतन पाती है.&lt;br /&gt;जागृति-क्रम में नई-नई धारायें क्रम से आती हैं.&lt;br /&gt;सह-अस्तित्व में गुंथी हुई है, आनन्दों की परिभाषा.&lt;br /&gt;समझें और समझायें, क्या होते विचार-इच्छा-आशा.&lt;br /&gt;चार अवस्था जान, यही है सच्चा ज्ञान.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-3336652384407183186?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/3336652384407183186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_7433.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/3336652384407183186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/3336652384407183186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_7433.html' title='चार  अवसता'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-1383250247042946278</id><published>2009-12-08T00:36:00.000-08:00</published><updated>2009-12-08T00:43:12.444-08:00</updated><title type='text'>रुपया</title><content type='html'>दुबई के शेयर-दुर्घटना पर विनीत पटावरीका आलेख पढा. भारत पर होते असर का विवरण देखा तो मनमें आया कि इस रुपये ने या मानव-निर्मित अर्थ-व्यवस्थाने हर मानवको सिर्फ़ दुख ही दुख दिया है. रुपया कमाओ तो दुख, न कमा सको तो दुख. रुपया आये तो साथमें दुख फ़्री. जाये तो दुख देकर जाता है. संयोगसे रुपये को लेकर ही एक अच्छे इंसान भारत भूषण से कल ही तकरार हो गई.... उस पर यह ट्टिपणी...साधक-उम्मेद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानाकि रुपये-बाजारने, जीना किया मुहाल.&lt;br /&gt;बिन रुपये भी चल नहीं सकता, हर मानव बेहाल.&lt;br /&gt;हर मानव बेहाल, नया कोई मार्ग तलाशे.&lt;br /&gt;रुपये के चलते धरती पर पट गई लाशें.&lt;br /&gt;कह साधक कवि बिन रुपयेके अच्छा मानव.&lt;br /&gt;जीवन विद्या सीखे तो बन जाये मानव.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-1383250247042946278?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/1383250247042946278/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_08.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1383250247042946278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1383250247042946278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_08.html' title='रुपया'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-1069172216856213221</id><published>2009-12-07T20:21:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T20:22:21.546-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गाय'/><title type='text'>गाय पालें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;एक प्रस्ताव &lt;/strong&gt;= &lt;br /&gt; आप भी अपनी गाय रखें.  जगहकी कमी हो, या उसकी देखभाल आप ना कर सकें तो मेरे सहित कई व्यक्ति सहायता कर सकते हैं. लाडनूँ में आप गाय रखें- लगभग ३५००-४०००/- रुपया चारा-खळी-गुङ आदि + ५००/- देखभाल + २००/- जगह, पानी आदि का मासिक खर्च आता है. आदमी पर भरोसा करें.  असली दूध-दही-घी खायें, आनन्द से लम्बा जीयें.  मैंने यही किया है. पूछ कर जानकारी लेंवें.... ०१५८१-२२५३१४.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-1069172216856213221?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/1069172216856213221/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_8319.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1069172216856213221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/1069172216856213221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_8319.html' title='गाय पालें'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-2083710050189970745</id><published>2009-12-07T19:52:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T20:03:35.728-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रुपया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रम'/><title type='text'>भूल का जिक्र</title><content type='html'>भारत भूषण दिल्ली के हैं. मेरे लिये बङे मनोयोगसे वेब साईट बनाई- नई आशा. तब मैं व्यवस्था परिवर्तन के अभियानमें श्री गोविन्दाचार्यजी के साथ कार्यरत था. ब्लागपर लिखा करता था.वेब परही उनका परिचय पाकर उत्साहसे दिल्ली गया. उनकी माँगसे ज्यादा पैसा भी दिया, कि सरलतासे कई बातें उनसे सीखनी है. नौ दिन - व्यापारी बुद्धिसे ठगते रहे... मन खट्टा हुआ. फिर कई बार फोन सम्पर्क- समझदार ज्यादा ही हैं... अहँकार मार रहा है... उनसे कल रात जो बात हुई.... वे स्वयं देखकर बतायें.... साधक.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल रात फिरसे भारत भूषण से बात की. वेब साईट तो अब नहीं चलेगी, लेकिन दोतरफ़ा कोशिश चलने पर भी दोनों के बीच समझ नहीं बन सकी. मेरा यह अनुमान गलत है कि रुपये लेकर वे खुश हो जायेंगे. उनका अनुमान गलत है कि मैं बार-बार अपना निर्णय बदलता हूँ. दिल्ली में उनसे पहली भेंट पर ही मन बना लिया था कि उनसे जमेगी नहीं. २५ की प्रथम सूचना, फोन पर ३५ हो गया.... और चालीस पाकर भी लार टपकाते मिले.... फिर भी कहते हैं कि पैसा नहीं, प्यार चाहिये. .... कल जो फोन पर बोले उसका सारांश लिखना चाहिये- १- पूरे वर्ष भर वेब साईट पर एक भी पोस्ट नहीं दी, यह मेरी गलती है.  क्यों भाई साहब! पूरे पैसे मिलनेके बाद और कोई बहाना नहीं मिला, जो यह बे-सिर-पैर की हाँकदी!  २- उनकी एक घंटे की रेट ५०००/- है.   बधाई हो.  ३- काम शुरु करना हो तो डोमेन रिन्यू के ९००/-+ होस्टिंग के १५५/- + १५०००/- देकर शुरु करुँ.  यह लो जी! आ गये रंगमें. यार मेरे, पहले वाला जो लिया, वहतो पचा लेते!  बिना श्रमके पचेगा कैसे? तभी तो दर्द हो रहा है पेटमें.... बार-बार गालियाँ.... दे लो यार! तुम इससे ही खुश हो सको तो यही सही. वैसे इस बीच आपने मेरी कुछ गलतियों की तरफ़ ध्यानाकर्षण किया, सही है... धन्यवाद दोस्त!   ४-  वे सारे सूत्र मुझे भेज देंगे, और उनको अब कोई रुपया नहीं चाहिये.  अब क्या फ़ायदा! मैंने तो नया ब्लाग बनाकर पोस्टिंग शुरु भी कर दी. इसे धीरे-धीरे सजा भी लूँगा... मित्रों की मदद से.... वैसे मजा तो तब आये, जब आपकी मदद मिले... बिना पैसे के लेन-देने के. ५- मैं साधक नहीं, अजीब प्राणी हूँ... मेरी किसीके साथ नहीं बन सकती....यस सर! लेकिन तबतो मुझे साधक होना ही चाहिये ना!.... परस्पर विरोधी बात कह दी आपने ... आपकी मर्जी!&lt;br /&gt;यदि पैसा बीचमें न आता तो भारतजी मानव अच्छे हैं. और मजा यह कि वे भी खुश नहीं हैं. सच ही कहा है... &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जान-बूझकर ना करे, कोई मानव भूल.&lt;br /&gt;मानव अच्छा मूलमें, भ्रमसे होती भूल.&lt;br /&gt;रे साधक! समझ बना अनुकूल.&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-2083710050189970745?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/2083710050189970745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_1320.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/2083710050189970745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/2083710050189970745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_1320.html' title='भूल का जिक्र'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-4517186517276469903</id><published>2009-12-07T19:28:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T19:30:28.803-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भय'/><title type='text'>परिवार-२</title><content type='html'>&lt;strong&gt;समृद्धि परिवार में निज में समाधान.&lt;br /&gt;प्रकृति में हो सन्तुलन, अ-भय रहे समाज.&lt;br /&gt;रे साधक सुख है समाधान.२.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मानव समझदार हो जाय तो वह समाधानमें रहता है. व्यवहारमें जबभी किसी मुद्दे पर असहमति का अवसर बनता है, तो समझदार मानव जान रहा होता है कि सामने वाला भी अपनी तरफसे सही कर रहा है. भ्रमित है, और भ्रमित अवस्थामें भूल होना स्वाभाविक है.  घरके एक सदस्य का जागृत होना बाकी सभी सदस्योंके लिये प्रेरणा और पूरकता का काम करता है. जागृति क्रममें सारे सदस्य उत्पादन कार्यमें आनन्द सहित लगते हैं, सह-अस्तित्व है ही, धरती पूरा सहयोग करती है- जरुरतसे ज्यादाका उत्पादन होता है. इस उत्पादनका उपयोग-सदुपयोग ही समृद्धि है. उपयोग परिवार के अर्थमें होता है, सदुपयोग समाजके . उत्पादन में प्रकृति सन्तुलन का विचार साथ-साथ चले तभी समृद्धि. आवर्तनशील विधिसे किया जाता है, अपराधमुक्त विधिसे किया जाता है. न किसीसे भय लेते हैं, न किसीको भय देते हैं. &lt;br /&gt;भय तीन कारणों से होते हैं, चार प्रकारके होते हैं.&lt;br /&gt;तीन कारण- पशु से भय, प्राकृतिक  आपदाओंका भय और भ्रमित मानव के अनिश्चित आचरण का भय.&lt;br /&gt;चार प्रकार – प्राणों का भय, पद जानेका भय, मान मिटनेका भय और धन जानेका भय. इन चारों प्रकारके भयों का समाधान जागृति में समाहित है. सबसे बङा भय यही है कि मैं मर न जाऊँ. देह यात्रा की समाप्ति को ही मृत्यु कहा जाता है, जबकि जीवन पर्यायमें मृत्युका अस्तित्व ही नहीं है. जीवन नित्य वर्तमान है. न कहीं जाता है, न कहीं से आता है, सदा वर्तमान रहता है. जीवनमें कालकी कोई भूमिका नहीं है, कालका सारा व्यापार देह तक सीमित है. भ्रमित मानवने कल्पना से ही स्वयं को देह मान लिया है, वैसे ही कल्पनासे काल को मान लिया है, कालका अस्तित्व नहीं है. प्राणों का भय भ्रमित मानवकी कल्पना मात्र है. जागृति पर यथार्थ समझ बन जाती है कि जीवन स्वयंको व्यक्त करने और जागृति के लिये देहका उपयोग करता है, जैसे मानव शरीर सुरक्षा के लिये वस्त्रालंकारका उपयोग करता है. पहला भय जाते ही शेष तीनों भय अपने आप गिर जाते हैं.मूल भ्रम का मिटना ही मुख्य है.&lt;br /&gt;मानव-मानव का परस्पर भय समाप्त हो तो शेष तीनों का आचरण निश्चित है. पशु भयसे समझदारी पूर्वक बचता है. प्राकृतिक घटनायें सदैव नियम पूर्वक होती हैं, और सर्व-शुभमें होती हैं. प्राकृतिक घट्नाओंमें सह-अस्तित्व नियमके रूपमें रहता है, और सह-अस्तित्व सदैव सर्वशुभ में सहयोगी बनता है. सबके शुभमें ही मानवका भी हित शामिल है, तो प्राकृतिक घटनायें भयका कारण नहीं. &lt;br /&gt;इस प्रकार समझदारीसे समृद्धि, अभय और प्राकृतिक सन्तुलन सभीकी सिद्धि संभव है.  इसका एक और आयाम भी है. वर्तमानमें सामाजिक-नैतिक आन्दोलनों में यह विवाद आम है कि सामाजिक और बदलाव और व्यक्ति-व्यक्तिकी सुधार में क्रम क्या होगा. व्यक्तिके सुधरने से समाज ठीक होगा, या समग्र व्यवस्था के ठीक होनेसे व्यक्ति ठीक होगा. पहले कौन का प्रश्न विवाद में ही है. व्यक्तिको सुधारनेके प्रयत्न नैतिक-सांस्कृतिक-धार्मिक मंचों से निरन्तर चल रहे हैं, तो दूसरी तरफ व्यवस्था परिवर्तन के लिये भी राजनैतिक स्तर पर गंभीर प्रयत्न चल रहे हैं. दोनों दिशाओं में आन्दोलन पूरे उत्साह में हैं. ग्रंथों का हवाला देकर व्यापक साहित्य का प्रकाशन-प्रसारण चलता है. उपदेशों के बलपर अनेक जन सन्त-महापुरुष बन जाते हैं, कथाओं के बङे आयोजन चलते हैं.... किन्तु नैतिकता का ग्राफ लगातार नीचे ही नीचे आता जा रहा है. चिन्तन-बैठकों में इस मुद्दे पर आकर ही गाङी अटकती है, किसीको कोई समाधान नजर नहीं आता. &lt;br /&gt;मध्यस्थ दर्शन इस दिशामें समग्र समाधान की कुँजी है. &lt;br /&gt;मानव अपनी जागृति का प्रयत्न अध्ययन पूर्वक करे. समझ से समाधान पाकर समृद्धि पाये. समझ का प्रमाण मानवके आचरण में मिलता है. ईमानदारी-जिम्मेदारी और भागीदारी साथ-साथ चलते हैं. समाजमें परिवर्तन सहजतया बन जाता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-4517186517276469903?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/4517186517276469903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2038.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/4517186517276469903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/4517186517276469903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_2038.html' title='परिवार-२'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-7753347671644550891</id><published>2009-12-07T19:25:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T19:26:41.115-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन विद्या'/><title type='text'>परिवार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अपने में बदलाव हो, तो संवरे परिवार.&lt;br /&gt;समझ बने तो विश्व में,  आये सहज सुधार. &lt;br /&gt;रे साधक! सहज ही रहे सुधार.१.&lt;/strong&gt;अपनी समझ बन जाये, तो फिर अपने ही परिवारमें प्रमाणित होना होता है.भ्रमित अवस्थामें   परिवार को ही सबसे ज्यादा कष्ट दिये रहते हैं, इस कारण अपने परिजनोंके  साथ बार-बार अप्रियता लाने वाले प्रसंग बनते हैं. उन प्रसंगों पर जागृति की परीक्षा हो जाती है. जेलमें एक कैदी ने विद्याको इतना समझ लिया कि वह जैलके अन्य बैरकों में जाकर शिविर लेने लग गयाथा. किन्तु उस कैदीको जब पेरोळ पर घर भेजा गया तो थोङे ही समयमें घर वालोंको असुविधा होने लगी, स्वयं उसको भी परेशानी हुई. सम्बन्ध में से अपेक्षा होती है. जब घरका कोई सदस्य इस प्रकारके किसी भी शिविरमें होकर घर लौटता है तब वह अपनी नई जानकारीकी चर्चा भी करता है. इस चर्चामें उसकी अपेक्षा होती है कि घरके सदस्य उस शिविरकी सूचनाके जैसा कार्य-व्यवहार करें. दूसरी तरफ घरके सदस्योंको उस सदस्यके आचरणमें कोई बदलाव नजर नहीं आता. इससे दोतरफा अपेक्षाओंका हनन होता है, परस्पर टकराव बढता है. &lt;br /&gt;बदलावका सूत्र है कि वह पहले स्वयंमें आता है. उसका प्रमाण कार्य-व्यवहारमें घरके सदस्योंको मिलता है. उसके आचरणसे सबजन प्रभावित होते हैं तो क्रमशः उनका आचरण भी उसी अनुरुप ढल जाता है. बदलावकी यही सहज गति है. ऊपरी उपदेशसे, या जबरदस्ती से किया गया बदलाव टिकता नहीं, क्योंकि कोईभी मानव दबाव पसन्द नहीं करता. सच्चा बदलाव समझ पूर्वक ही आता है. बिना समझ के दबाव का विपरीत प्रभाव भी आता है. किशोरावस्था में आत्महत्याओं का क्रम इसी दबाव के कारण बढा है. &lt;br /&gt;समझके आधार पर आया बदलाव सार्थक और स्थायी होता है. &lt;br /&gt;सामाजिक-व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान का सही रास्ता समझ बनाना ही है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-7753347671644550891?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/7753347671644550891/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_07.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7753347671644550891'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/7753347671644550891'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post_07.html' title='परिवार'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_sCpwcDKnjvM/S0baUXwQA-I/AAAAAAAAAD4/G0dBwHr-Nlk/S220/DSC04471.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4552086306095484306.post-6782528002846225062</id><published>2009-12-07T19:16:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T19:21:24.337-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन विद्या'/><title type='text'>उत्सवित जीवन के गीत</title><content type='html'>फ़िर आया हूँ दोस्तों, लेकर जीवन गीत.&lt;br /&gt;नित्य मिलूँगा आपसे, आप बनें मन-मीत.&lt;br /&gt;ये साधक, देता जीवन गीत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4552086306095484306-6782528002846225062?l=ummed-baid.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ummed-baid.blogspot.com/feeds/6782528002846225062/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6782528002846225062'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4552086306095484306/posts/default/6782528002846225062'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ummed-baid.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='उत्सवित जीवन के गीत'/><author><name>Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak "</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07864795175623338258</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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